:: ॐ नमों भगवते वासुदेवाय । ॥ :: श्री गणेश स्तुति वक्र तुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ: । निरविध्नंकरुमें ...
:: ॐ नमों भगवते वासुदेवाय । ॥ ::
श्री गणेश स्तुति
वक्र तुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ: ।
निरविध्नंकरुमें देव सर्व कार्येषु सर्वदा ॥
:: सरस्वती देवी की वंदना ::
नमस्ते सारदा देवी काश्मीरी वासिनी ।
त्वामहं प्राथये नित्य विध्यदान च देही में ।
:: पवित्र सन्देश ::
घोर अँधेरे की धड़ीया है अपने को परखों और परखाओं ।
मेरे अन्तर की ज्वाला तुम घर -घर दीप सिखा बन जाओं ।
अपनी जाती वंश मर्यादा है मन दुःख में भूल न जाओं ।
मेरे अन्तर की ज्वाला तुम घर -घर दीप सिखा बन जाओं ॥
:: दोहा ::
जस आखर लिखेन जठे वा धरती मर जाय ।
संत ,सती और सूरमा ए ओझल हो जाय ॥
कोट खिसे देवल डिगे वृक्ष ईंधन हो जाय ।
जस रा आखर जोड्या जातां जुगा न जाय ॥
:: दो शब्द ::
सज्ञान होकर जो मनुष्य अपने पूर्वजों के गौरव की रक्षा नहीं करता ,शिक्षित होकर भी जो मनुष्य भाषा व् साहित्य का आदर नहीं करता ,समर्थ होकर भी जो मनुष्य साहित्य की परिपुष्टि करके अपनी जाती व् अपने देश को ज्ञानोन्त नहीं करता ,वह मनुष्य अपने कर्तव्य से विमुख अर्थात मूर्ख समझा जाता ।
( गोपाल सिंह भाटी तेजमालता )
श्री गणेश स्तुति
वक्र तुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ: ।
निरविध्नंकरुमें देव सर्व कार्येषु सर्वदा ॥
:: सरस्वती देवी की वंदना ::
नमस्ते सारदा देवी काश्मीरी वासिनी ।
त्वामहं प्राथये नित्य विध्यदान च देही में ।
:: पवित्र सन्देश ::
घोर अँधेरे की धड़ीया है अपने को परखों और परखाओं ।
मेरे अन्तर की ज्वाला तुम घर -घर दीप सिखा बन जाओं ।
अपनी जाती वंश मर्यादा है मन दुःख में भूल न जाओं ।
मेरे अन्तर की ज्वाला तुम घर -घर दीप सिखा बन जाओं ॥
:: दोहा ::
जस आखर लिखेन जठे वा धरती मर जाय ।
संत ,सती और सूरमा ए ओझल हो जाय ॥
कोट खिसे देवल डिगे वृक्ष ईंधन हो जाय ।
जस रा आखर जोड्या जातां जुगा न जाय ॥
:: दो शब्द ::
सज्ञान होकर जो मनुष्य अपने पूर्वजों के गौरव की रक्षा नहीं करता ,शिक्षित होकर भी जो मनुष्य भाषा व् साहित्य का आदर नहीं करता ,समर्थ होकर भी जो मनुष्य साहित्य की परिपुष्टि करके अपनी जाती व् अपने देश को ज्ञानोन्त नहीं करता ,वह मनुष्य अपने कर्तव्य से विमुख अर्थात मूर्ख समझा जाता ।
( गोपाल सिंह भाटी तेजमालता )

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