वीर तेजमाल जी भाटी का हीले जट से युद्ध

                                                                                ::  वीर तेजमाल जी भाटीतेजमालोत :: तेजमाल जी बड़े वीर साहसी ए...

                                       

                                        ::  वीर तेजमाल जी भाटीतेजमालोत ::
तेजमाल जी बड़े वीर साहसी एवं प्रतिभाशाली थे | इन्होने विक्रमी संवत 1760 वैसाख सुदी पंचम को काली माली पर गढ़ का निर्माण करवाकर गाँव बसाया और कासाऊ कुए का निर्माण करवाया | संवत 1750 में जैसलमेर की हवेली में रावों को दान दिया |  आपका स्वर्गवास संवत 1763 विक्रमी वैसाख सुदी आठम को जुझार हुए | इनका ऐक थान पूनम नगर गाँव तथा दूसरा पूनम नगर की गेह तलाई पर हे |

                                     :: तेजमाल जी का हीले जट से युद्ध ::
हीला जट गुजरात प्रदेश में मुसलमान बादशाह था | वह बहुत हि प्रतिभाशाली था |  उसके नाम से लोग थरथराने लग जाते थे |  यहाँ तक की आज भी माताएं आपने बच्चों को हीलो - हीलो करके सुलाती हे और निंद्रा आ जाती हे उस हीला ने सिरवा गाँव के रतनु चारण को मार दिया था | मरते वक्त चारण ने ऐक दोहा कहा जो इस प्रकार हे
                                           पंथिया जाय संदेशों तेजल ने देयं |
                                        रतनु थारो हीले मारयो तुरंत खबर लेय ||
इस प्रकार दोहा ऐक राहगीर ने सुनकर गढ़ कासाउ काली माली पर विराजमान तेजमाल जी को सुनाया | सुनते हि तेजमाल जी अपनी सेना लेकर हीले से युद्ध करने भुज शहर की और रवाना हुए और भुज प्रदेश में जाकर हीले जट से युद्ध करके उसे व् उसके सेनिको को मारा जिसका वर्णन दोहा व् छंदों में निम्न प्रकार है |

१ . शरणागत तेजल शूरा बिसरे न रतनू बैर |
      हीले जट मारीओ हतो रवल न थारी खेर ||
२    दल दल चौकस दरसे ,परसे पर्वत पंथ  |
      दल तेजल दोड़ीया गाँव सुई का ग्रन्थ ||
३ थरके ठाकर चौहान , थरके उनका थान |
    हीलो तो मारसे हम ने पिंड फाटत प्राण ||
४ कटक ऐक सहस्र कहूँ , सहस्र हे ऐक समान |
    नव हथो हीलो निरखे , फाटत पिंजर प्राण ||
५ ऐक भील देखा अपना फरवारो जानो सुधीर |
    महा प्रतापी तेजल मानो लोह तणी लकीर ||
६ ओ घर -घर तेजे आपसी पूगा डेरा पास
     बकर खां का बटका किया बिलाया कुकर पास ||
७ ललकार हीले को लियो बाढ़ीयो ऐक हि बार |
   पावरे सीस धरे अश्व हुए अश्वार ||
 ८ ऐक बटके दही आरोगे बंका बीसों वीर |
     तूं अलग थलग तेरा धरो न कायर धीर ||
९ गूजर कहे पधारो धरों ऐसा है ऐहनाण |
    अपड़ावे नहीं हाथ न आवे पुरुष तेजोतनो प्रवाण ||

                                                   :: त्रोटक छंद ::
गननायक शारदा कथ ग्रहों रतनू निज चारण वैर लड़े |
असवार दशों दिस व्योम उड़े भुज डूगर जाय भिड़े  ||
मन मोहन तेजल वीर बड़ों रण पार कियो वह भिड रुड़ो |
बटका कर बांकर खां थिड़े भुर्जलो हिले ते भिड़े  ||
कर शीश प्रहार सुदूर पड़े , अपने कर ले वे उपडे |
अस पावर डाल विशाल नव सेर उतोलक बाजी चढो ||
धम पड़े पमंग उलाल किया रणरतन सवार पार किया |
जब गूजर भी मनवार करी बटके बिन मांजन रीत पड़ी ||
असवार हुयो सबने मोहरी भिन्न भाव नहीं सब ऐक भरी |
जब बाहर दोड़त आयरसे कर जांखल पात्रघसे |
तुम जाओ घरों अपड़ाय नहीं घर जोजन बीस गयो असहि |
मुद जंगल यादव प्रीत छपे कुल चारण तेजल नाम जपे  ||
धन वीर समागम जोर धरे निज वंश प्रश्सित शोभ भरे |
सुख संपत मेल निवास तरे छतरालियो जोगतराज करे ||
 
                                                                       :; दोहा ::
१ सुख संपत रा भरया संदन अमृत बोल अपार |
   प्रत्येक भाई रहे प्रेम से बाजे तेजलरी वार  ||
२ सखर ज्यों सर्वरों गिरवर ज्यों तूं गोण |
   सागर ज्यों गंभीर सुधि रंग हो तेजल रेण ||
३ लोहू पिंडाल बांध लिया ऊपर नीर उड़ेल |
   धन्य जननी धन्य पिता डाकि तेजो डकरेल ||
४ कोप से गढ़ कांपता शत्रु भूलता साँस |
   बिन हथियार मारियो बेरी बन्दुक धारी बदमास ||
५ अमर तेजल नाम आपरो असंख्य  जुगो इख्यात |
   रंग हो राम सिंह रा बांकी तुम्हारी विख्यात  ||
                                                              :: दोहा ::
 तेजल डेरा तंवारा गेह ऊपर गेहतूल |
रमण पधारो राम रा हाथाली हाबुर ||
विलाले ऊपर कियो पाखडो भीड़या तंग अलल |
किंण ऊपर कोपयो तू भाटी तेजल |
                                                         :: गगर निशानी :;
गगर निशानी अच्छी वाणी ढाढ़ी पेच चडाईंदा |
भाटी तेजल रा भारत भला बागन जेम बेड़ाईंदा ||
शाक्त साजोड़ो घुमर घोड़ो दूरो द्रप दिखाईंदा ||
पेरे बागा सिंधे लागा पागों पेच झुकाईंदा |
कड़ीधर कछ्ची ओढ़ण अच्छी पामड़ीया फरराईंदा ||
तेरा तप ऐसा सूरज जैसा दुनिया ज्योति ज्योत दिखाईंदा |
रामावत रुड़ा कथन न कूड़ा सायब बंदा साईंन्दा   ||
                                                                      :: छंद ::
कियो ओसोण बढ़ कारणे देश री रक्षा कर शरण दीधो |
भाटी जैसाण रे भड़ ऊसर भांज्या कोट शीशे रो चोचाड़ कीधों ||
वैर रतनू तनों धणी बालियों पालियो वचन ज्यों राव पाबू |
आवता लुटवा देश उसराण रा कटक बहता किया सब काबू ||
झाटके खाग सु अरी सिर झाडयो धरा पर पाड़यो पड़ धाके |
सिराईयों तणा बहे अकल दल साबल हिले ने मारयो पवंग ||
पांच हजार बिच पाड़ दल पाटवी माड़पत अमर हाके जस नाम कीधो |
गूड़ ऊसर तनों उधर भर बीधणी पात भर जोगणी रूधिर पीधो ||
मारयो ऐकले बाघ ज्यों मिरगलो झुण्ड में तुरंत भड़लियो झाटे  |
साकवे चोचाल देख सिचोण ने बिखर गया तुरकड़ा घाट बांटे ||
खेल तुझ सरीखो नहीं कोई खेलवे रेल कर खलकिया रक्त  रेले |
रामासुत अरियो ने धाक सू रोकया झोक्या तुरक तरवार झेले ||
स्वाग नृप विजय ने आवड़ा समापी तेजल आ अरी रे शीश ताड़ी |
खेताहर रण जीत कर खट्यो वीर जयसोणे रे वार बजायी |
भोड़ ऊसर तनों लायो भेंट में चारणी माता रे थड़ चाडे  ||
कियों घण चोज रेणुओं कारण पांथू कज सारण  |
दुष्ट  पाड़यो कियो ओसोण बढ़ चारणों कारणे ||
लगातार ..............
जय श्री कृष्णा सा

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