राजीव गांधी की हत्या के बाद कैसे बदल गई थी 1991 में चुनावों की तस्वीर?

21 मई को रात 10.21 बजे चेन्नई के करीब श्रीपेरांबुदूर में राजीव गांधी की हत्या कर दी गई, तब देश में चुनाव चल रहे थे. 90 के दशक में भारत...

21 मई को रात 10.21 बजे चेन्नई के करीब श्रीपेरांबुदूर में राजीव गांधी की हत्या कर दी गई, तब देश में चुनाव चल रहे थे.

90 के दशक में भारत में ना तो स्मार्ट फोन थे और ना ही किसी तरह के मोबाइल फोन. टीवी के नाम पर दूरदर्शन था. प्राइवेट टीवी न्यूज चैनल का भी कहीं नामोनिशान नहीं था. एक शहर से दूसरे शहर में फोन भी बहुत मुश्किल से ही मिलते थे. हालांकि, एसटीडी के मामले में काफी काम हो चुका था. डिजिटल मीडिया के बारे में तो तब कोई सोचता ही नहीं था. अखबारों में तब आवाज करने वाले टेलीप्रिंटर हुआ करते थे. उनमें रात करीब साढ़े दस बजे एक लाइन का फ्लैश आया. मद्रास के करीब एक जनसभा में बम विस्फोट, राजीव गांधी नहीं रहे. अखबारों के आफिसों में ये खबर स्तब्ध कर देने वाली थी. इसके बाद खबरों ने जब विस्तार लेना शुरू किया, तो ये साबित हो गया कि वास्तव में राजीव गांधी नहीं रहे. उस रात देशभर के अखबारों के ऑफिसों में देखते ही देखते इस खबर को यथासंभव विस्तार और हर पहलू से देखने की कोशिश की गई. ये इंडियन एक्सप्रेस का 22 मई का अंक है.
मुंबई से प्रकाशित होने वाले फ्री प्रेस जनरल में ये खबर यूं प्रकाशित हुई. उन दिनों लोकसभा के चुनाव चल रहे थे. 20 मई को पहले चरण के लोकसभा चुनाव की वोटिंग हो चुकी थी. इसके बाद अगले दो चरणों के चुनाव स्थगित कर दिये गए. ये फिर 12 और 15 जून को हुए. पहले चरण में 534 सीटों में 211 पर वोट पड़ चुके थे. राजीव गांधी की हत्या से पहले जो वोटिंग हुई थी, उसमें कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत खराब था, लेकिन अगले दोनों चरणों में कांग्रेस ने बढ़िया प्रदर्शन किया. हालांकि, जब चुनाव परिणाम आए तो कांग्रेस ने लेफ्ट पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाई थी. पीवी नरसिंह राव इस चुनाव के दौरान ही राजनीति से संन्यास लेकर आंध्र प्रदेश में अपने गांव जाने की घोषणा कर चुके थे लेकिन राजीव गांधी की हत्या के बाद वो चुनावों के बाद कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में नेता की रेस में शामिल हो गए.
टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस खबर को पूरे विस्तार से छापा. उसने खबर के साथ एक संपादकीय भी प्रकाशित किया, जिसमें ये कहा गया था कि राजीव का निधन देश की कितनी बड़ी क्षति है. साथ ही सोनिया गांधी और बच्चों के सुरक्षित रहने पर एक खबर अलग से प्रकाशित की. सोनिया, प्रियंका और राहुल दिल्ली में थे. राजीव की हत्या के बाद पूरे देश में अलर्ट घोषित कर दिया गया. हालांकि, पूरे देश में अगले दिन सदमे की स्थिति थी. आकाशवाणी लगातार विशेष बुलेटिन ले रहा था. टाइम्स ने पहले पेज के अलावा अंदर के पेजों पर भी राजीव से जुड़ी खबरेें और तस्वीरें प्रकाशित कीं. उस जमाने में अखबारों में कंप्यूटर का इस्तेमाल नहीं शुरू हो पाया था, लिहाजा आज के मुकाबले पेजों का डिजाइन हाथ से कंपोज की हुई खबरें और फोटो चिपका कर होता था. ये समय लेने वाला प्रोसेस होता था.
हिंदुस्तान टाइम्स ने "राजीव एसिसनेटेड" हेडिंग से पहले पेज पर प्रमुखता से ये खबर प्रकाशित की. रातभर में ही ये खबर देशभर में फैल चुकी थी. ये तब था जब वाकई कम्युनिकेशन के बहुत दमदार साधन नहीं थे. मद्रास से 25 किलोमीटर दूर श्रीपेरांबुदूर, जहां ये हादसा हुआ, वहां एक आत्मघाती महिला हमलावर ने राजीव के करीब जाकर खुद को विस्फोट से उड़ा लिया था. ये हादसा रात 10.20 पर हुआ था. इस हादसे में 20 से ज्यादा लोग मारे गए थे.
दुनियाभर के अखबारों में राजीव गांधी की हत्या की खबर काफी प्रमुखता से प्रकाशित हुई. द न्यूयॉर्क टाइम्स ने छापा, राजीव गांधी की बम विस्फोट से हत्या. चुनाव बीच में रोका गया. इसे अखबार ने पहले पेज पर लीड खबर बनाया, साथ ही दिल्ली में राजीव गांधी के खबर के सामने शोक में डूबे लोगों की तस्वीर भी छापी. उस समय न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट बारबरा भी इस चुनावी सभा को कवर करने के लिए गई थी.
राजीव गांधी की चेन्नई से करीब 25 किलोमीटर दूरे श्रीपेरांबुदूर में जहां हत्या हुई थी, वहां अब एक स्मारक बनाया गया है. वो काफी शांत है. राजीव ने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में हुए चुनावों में कांग्रेस की जीत के बाद प्रधानमंत्री का पद संभाला था. लेकिन वो हमेशा कहते थे कि मैं राजनीति में नहीं आना चाहता था.
हत्या के पहले जब किसी ने राजीव गांधी से पूछा था कि वो क्या अपनी क्या पहचान लेकर जाना चाहेंगे, तो उनका जवाब था, एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जो भारत को 21वीं सदी में लेकर गया, जिसने देश के माथे से विकासशील देश का लेबल हटाया.

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सरकारी योजनाएँ: राजीव गांधी की हत्या के बाद कैसे बदल गई थी 1991 में चुनावों की तस्वीर?
राजीव गांधी की हत्या के बाद कैसे बदल गई थी 1991 में चुनावों की तस्वीर?
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