केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग ( ओबीसी ) की भागीदारी बढ़ गई है. जनवरी 2012 में ओबीसी का नौकरियों में प्रतिनिधित्व 16.55 पर...
यह आंकड़ा संघ लोकसेवा आयोग एवं चुनाव आयोग सहित 78 मंत्रालयों, विभागों और उनसे संबंधित कार्यालयों में काम करने वाले ओबीसी कर्मचारियों का है. केंद्र सरकार ने दिसंबर 2014 में ही रिजर्व सीटों के बैकलॉग की पहचान करने, ऐसा होने के कारण जानने और विशेष भर्ती अभियान के जरिये ऐसे खाली स्थानों को भरने के लिए मंत्रालयों, विभागों को एक आंतरिक समिति गठित करने के निर्देश दिए थे. इसके बाद इसमें तेजी आई है.
जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण की मांगकार्मिक विभाग के आंकड़ों की मानें तो आज भी सरकारी नौकरियों में सामान्य वर्ग की भागीदारी 57.79 फीसदी है. वहीं बड़े पदों की बात करें तो ये आंकड़ा 74.48 प्रतिशत तक पहुंच जाता है. इसीलिए ओबीसी समुदाय के नेता लगातार मांग करते रहे हैं कि एससी/एसटी ( आबादी: एससी-16.63, एसटी-8.6 फीसदी, आरक्षण: एससी- 15, एसटी- 7.5 फीसदी) की ही तरह उन्हें भी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण मिले.
बीजेपी प्रवक्ता राजीव जेटली का कहना है कि मोदी सरकार हर वर्ग के लिए काम कर रही है, चाहे वो पिछड़ा हो, अनुसूचित जाति का हो या सामान्य वर्ग का. इसीलिए नौकरियों में पिछड़ा वर्ग की हिस्सेदारी बढ़ी है. उम्मीद है कि आगे और बढ़ेगी. यही सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास मंत्र है.
पिछड़ों में भी पिछड़े लोगों पर दांवओबीसी में भी सबसे पिछड़ी जातियों को लाभ देने के लिए मोदी सरकार ने 27 फीसदी कोटे के अंदर कोटा देने का प्लान बनाया हुआ है. सरकार उन जातियों को ज्यादा लाभ देने की कोशिश में है जो ओबीसी में तो हैं लेकिन उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल सका. उनकी नौकरियों में भागीदारी नहीं हो पाई. ओबीसी सब-कटेगराइजेशन के लिए 2 अक्टूबर 2017 को सरकार ने एक आयोग गठित किया था. जिसकी अध्यक्ष दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व मुख्य न्यायाधीश जी. रोहिणी हैं.
यह आयोग तय कर रहा है कि ओबीसी में शामिल ऐसी कौन सी जातियां हैं जिन्हें आरक्षण का पूरा लाभ नहीं मिला और ऐसी कौन सी जातियां हैं जो आरक्षण की मलाई खा रही हैं. माना जाता है आरक्षण का लाभ कुछ ही जातियों ने उठाया. बाकी सब हाशिए पर रहीं.


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