कर्नाटक का मौजूदा सियासी संकट लोकतंत्र से क्या सवाल कर रहा है

कर्नाटक में एचडी कुमारस्वामी सरकार पर आए संकट के बीच कई सवाल पैदा हुए हैं, जो जनप्रतिनिधि, सियासी दल, स्पीकर और राज्यपाल के अधिकारों के सा...

कर्नाटक में एचडी कुमारस्वामी सरकार पर आए संकट के बीच कई सवाल पैदा हुए हैं, जो जनप्रतिनिधि, सियासी दल, स्पीकर और राज्यपाल के अधिकारों के साथ दलबदल कानून और जनता के वोट की गरिमा से जुड़े 

कर्नाटक विधानसभा में एक बार फिर जिस तरह सियासी संकट खड़ा हो गया है. वो लोकतंत्र और संविधान से भी कुछ सवाल तो करता ही है. इन सवालों के कठघरे में लोक भी है, तंत्र भी और इनसे जुड़ी संस्थाएं और सियासी दल भी.

पहला मूलभूत सवाल यही है कि क्या इस लोकतंत्र में जनता की भूमिका केवल इतनी सी है कि वो वोट दे, किसी को जिताए और फिर ठगे रहकर सारे तमाशे को देखती रहे और खुद को ठगा सा महसूस करे. पिछले कुछ सालों में जनता के वोट लगातार ये सवाल तो जरूर पूछते रहे हैं कि हम क्यों वोट देते हैं,  हमारे वोटों की इस लोकतंत्र की अगर कोई गरिमा है तो क्या उसकी रक्षा हो रही है.
सवाल नंबर एक - क्या जनता के वोटों की गरिमा है
जब हमारा संविधान तैयार हो रहा था तो इसकी मूलभावना ये भी कि ये जनता की आंकाक्षाओं पर खरा उतरे. साथ ही लोकतंत्र में उसके चुने हुए प्रतिनिधि संविधान की आकांक्षाओं पर खरे उतरें. क्या वास्तव में ऐसा हो रहा है. कर्नाटक में पिछले एक साल में जिस तरह बार बार सियासी संकट की स्थिति बनी है. उसे जनता के केवल मूक होकर देखने की स्थिति में है.

अबकी बार जिस तरह सत्ताधारी गठजोड़ के 15 बागी विधायकों ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा स्पीकर के पास भेजा है. उसने इस सवाल को जन्म दिया कि चुना हुआ जनप्रतिनिधि किन हालात में अपनी मर्जी से उस पद को छोड़ सकता है, जिसमें जनता की भी भागीदारी है. क्या उसके इस फैसले में जनता की मर्जी नहीं होनी चाहिए कि वो जो फैसला कर रहा है वो कितना सही या गलत है.

जन के वोट की वाकई कोई गरिमा है या फिर उसकी भूमिका वोट देने के बाद खत्म हो जाती है
एक या दो विधायक अगर किसी वाजिब कारण से अपनी विधायकी या सांसदी छोड़ते हैं तो समझ में आता है कि कोई व्यक्तिगत या आवश्यक वजह होगी कि उन्होंने ऐसा किया, लेकिन अगर एक साथ ऐसा काम बड़ी संख्या में एक साथ हो रहा है तो क्या ये संविधान की भावना का सम्मान करता है.

सवाल नंबर दो- इसमें पार्टी की क्या भूमिका हो
चूंकि हमारे यहां लोकतंत्र की बुनियाद लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचन और सियासी दलों पर रखी गई है.  लिहाजा सियासी दलों को भी खास दर्जा या मान्यता हासिल है. अगर किसी पार्टी से चुना हुआ विधायक या सांसद सदन में अपनी सदस्यता यानि जनप्रतिनिधि की स्थिति बरकरार नहीं रखना चाहता तो उसे सीधे स्पीकर के पास जाना चाहिए या फिर पहले अपने सियासी दल की रजामंदी लेनी चाहिए, इसके बाद ही ये स्पीकर के पास अग्रसारित किया जाए.

सवाल नंबर तीन - सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या सियासी दलों के मौलिक अधिकारों का हनन है
सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के 15 बागी विधायकों के बारे में फैसला दिया कि वो सदन कार्यवाही से गैरमौजूद रहने के लिए स्वतंत्र है, पार्टी उन पर इसके लिए कार्यवाही नहीं कर सकती.

पिछले दो दिनों से कर्नाटक विधानसभा में सुप्रीमकोर्ट के इसी फैसले पर बहस हो रही है. ये फैसला भविष्य की भारतीय राजनीति में भूचाल ला सकता है तो नई परिपाटी भी रच सकता है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सियासी पार्टियों के मौलिक मूलभूत अधिकारों को लेकर भी बहस शुरू हो गई है

सदन में इस मुद्दे पर सवाल खड़ा करने वाले सिद्दारमैया ने मीडिया से कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बाग़ी विधायक विधानसभा की कार्रवाई से अनुपस्थित हो सकते हैं. इसका मतलब ये है कि जिस पार्टी से वे संबंध रखते हैं वो व्हिप जारी नहीं कर कती है. व्हिप न जारी करना एक राजनीतिक पार्टी के रूप में हमारे अधिकारों का हनन है."

आखिर वो विधायक एक पार्टी के चुनाव चिन्ह पर जीत कर आया. उसके निर्वाचन और जीत के पीछे उस पार्टी के तंत्र और संसाधनों का इस्तेमाल हुआ. साथ ही पार्टी ने उसके निर्वाचन में जीत के लिए समय और धन का भी योगदान दिया.

संविधान हर सियासी दल को व्हिप के तौर पर एक खास अधिकार देता है, ताकि खास मौकों पर उसका निर्वाचित प्रतिनिधि उसके नीतियों और निर्देशों के अनुसार फैसले ले.

सवाल नंबर चार - स्पीकर के अधिकार और सीमा कहां तक होती है
कर्नाटक के गवर्नर ने गुरुवार देर शाम यानि 18 जुलाई को कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी  और स्पीकर सुरेश कुमार को पत्र लिखकर निर्देश दिया कि वो हर हाल में विश्वासमत की कार्यवाही को अगले दिन यानि 19 जुलाई को दोपहर 1.30 बजे तक खत्म कर लें.

स्पीकर ने इसे मानने से मना कर दिया. उन्होंने कहा कि विधानसभा की कार्यवाही किस तरह संपादित हो इसके लिए राज्यपाल उन्हें निर्देशित नहीं कर सकते बल्कि संविधान के तहत वो इसका फैसला खुद करेंगे. उन्होंने दो-टूक कहा कि वो पहले जब तक सदन में विश्वासमत पर बहस नहीं करा लेते तब तक वोटिंग नहीं होगी.

सवाल नंबर पांच - राज्यपाल क्या स्पीकर को निर्देश दे सकता है
जिस तरह कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला ने स्पीकर को पत्र लिखकर उन्हें अगले दिन दोपहर तक विश्वासमत की कार्यवाही पूरी कर लेने को कहा, क्या वो स्पीकर को वैसा निर्देश दे सकते हैं. भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ये पहला मौका है जबकि किसी राज्यपाल ने अपने राज्य की विधानसभा के स्पीकर को ऐसा निर्देश दिया हो.

क्या दलबदल कानून को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है.मौजूदा कानून कहीं ना कहीं अप्रासंगिक लगने लगा है


सवाल नंबर छह - क्या दलबदल कानून मौजूदा हालात में अप्रासंगिक हो चुका है
कर्नाटक मामले को लेकर दल-बदल कानून पर सबकी नजर है. यह कानून कहता है कि निर्वाचित सदस्य यदि विशेष परिस्थितियों में अपनी पार्टी छोड़ते हैं तो इसका मतलब उनकी सदस्यता का रद्द होना होता है. भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची को दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है. इसे 1985 में 52वें संशोधन के साथ संविधान में शामिल किया गया था.

इस कानून की जरूरत तब महसूस हुई जब सियासी फायदे के लिए लगातार सदस्यों को बगैर सोचे समझे दल की अदला बदली करते हुए देखा जाने लगा. अवसरवादिता और राजनीतिक अस्थिरता बहुत ज्यादा बढ़ गई थी और इससे जनादेश की अनदेखी होने लगी थी.
स कानून के मुताबिक कोई सदस्य सदन में पार्टी व्हिप के खिलाफ जाकर वोटिंग करे या यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से त्यागपत्र दे अथवा कोई निर्दलीय, चुनाव के बाद किसी दल में चला जाए या यदि मनोनीत सदस्य कोई दल ज्वॉइन कर ले तो उसकी सदस्यता रद्द हो जाएगी.

वर्ष 1985 में कानून बनने के बाद भी जब अदला बदली नहीं रुकी तो इसमें संशोधन किया गया. वर्ष 2003 में यह तय किया गया कि सिर्फ एक व्यक्ति ही नहीं, बल्कि यदि सामूहिक रूप से भी पार्टी बदली जाती है तो उसे असंवैधानिक करार दिया जाएगा.

इसी संशोधन में धारा तीन को भी खत्म कर दिया गया जिसके तहत एक तिहाई पार्टी सदस्यों को लेकर दल बदला जा सकता था. अब ऐसा कुछ करने के लिए दो तिहाई सदस्यों की रजामंदी की जरूरत होगी.

यही अहम प्रावधान कर्नाटक की मौजूदा स्थिति पर भी लागू होता है, जो सदन में किसी भी पार्टी के दो तिहाई से कम विधायकों को तोड़ने से रोकता है. पार्टी के सदस्यों को तोड़ा न जा सके इसलिए उन्हें एक साथ रखने के लिए शहर के बाहर किसी रिजॉर्ट में रखा जाता है.

बहरहाल, चुनाव आयोग इस कानून को लेकर अपनी भूमिका में स्पष्टता चाहता है. बीच में यह मांग भी उठी है कि ऐसे हालात में स्पीकर या अध्यक्ष की राय की समीक्षा भी ठीक से की जानी चाहिए. और तो और स्वेच्छा से दल छोड़ने के अर्थ की भी ठीक से व्याख्या की जाए. क्योंकि इस कानून का इस्तेमाल सदस्य को अपनी बात रखने से रोकने और पार्टी ही सर्वोच्च है कि भावना को सही ठहराने के मकसद से भी किया जा सकता है.

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सरकारी योजनाएँ: कर्नाटक का मौजूदा सियासी संकट लोकतंत्र से क्या सवाल कर रहा है
कर्नाटक का मौजूदा सियासी संकट लोकतंत्र से क्या सवाल कर रहा है
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